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अपनी मौत का समय भी जानते थे स्वामी विवेकानंद-मृत्‍यु से पहले धोए थे श‍िष्‍यों के पैर

पत्रकार ब्लॉग 12 Jan, 2018 04:26 AM
swami vivekanand

जितना बड़ा संघर्ष होगा जीत उतनी ही शानदार होगी और जब तक जीना, तब तक सीखना, अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है – जिंदगी का सार देने वाले ये शब्‍द स्‍वामी विवेकानंद के हैं।

भारत में हर साल 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। भारत सरकार ने 1984 में स्वामी विवेकानंद की जयंती पर इसे मनाने की घोषणा की थी। स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट में एक प्रसिद्ध वकील थे। उनकी मां भुनवेश्वरी देवी गृहिणी थीं। विवेकानंद के दादा दुर्गाचरण दत्त संस्कृत और फारसी के ज्ञाता थे। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में आने के बाद विवेकानंद ने अपना परिवार 25 साल की उम्र में ही छोड़कर सन्यास ले लिया था। माना जाता है कि वो बचनप से ही कुशाग्र बुद्धि और नटखट थे। इसी के साथ वो धार्मिक विचारधारा वाले थे, हर दिन के नियम में उनके पूजा-पाठ शामिल था। विवेकानंद की माता धार्मिक प्रवृत्ति की थीं जिस कारण उन्हें पुराण, रामायण, महाभारत आदि की कथा सुनने का बहुत शौक था। परिवार के धार्मिक और आध्यात्मिक वातावरण का प्रभाव बाल नरेंद्र के मन में बचपन से ही ईश्वर को जानने और उसे प्राप्त करने की लालसा दिखाई देती थी।
सन् 1871 में, आठ साल की उम्र में विवेकानंद ने ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में दाखिला लिया। 1877 में उनका परिवार रायपुर चला गया। 1879 में कलकत्ता में अपने परिवार की वापसी के बाद वह एकमात्र छात्र थे जिन्होनें प्रसीडेंसी कॉलेज प्रवेश परीक्षा में प्रथम डिवीजन अंक प्राप्त किए। दर्शन, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य सहित विषयों में अधिक रुचि थी। नरेंद्र को भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित किया गया था। विवेकानंद ने पश्चिमी तर्क, पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का अध्ययन जनरल असेंबली इंस्टिटूशन में किया था। 1884 में उन्होनें स्नातक की डिग्री प्राप्त की। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के देहांत के बाद स्वामी विवेकानंद ने पूरे देश में रामकृष्ण मठ की स्थापना की थी।

विवेकानन्द बड़े सपने देखने वाले थे। उन्‍होंने एक ऐसे समाज की कल्‍पना की थी जिसमें धर्म या जाति के आधार पर मनुष्‍य-मनुष्‍य में कोई भेद न रहे। उन्‍होंने वेदान्त के सिद्धान्तों को इसी रुप में रखा। अध्‍यात्‍मवाद बनाम भौतिकवाद के विवाद में पड़े बिना भी यह कहा जा सकता है कि समता के सिद्धान्त का जो आधार स्वामी विवेकानन्‍द ने दिया उससे सबल बौद्धिक आधार शायद ही ढूँढा जा सके। विवेकानन्‍द को युवकों से बड़ी आशाएं थीं। विवेकानंद के व्याख्यान दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। भारत का वेदांत अमेरिका और यूरोप के हर देश में स्वामी विवेकानंद के कारण ही पहुंचा था। 4 जुलाई 1902 को उनकी मृत्यु हुई थी।

मृत्‍यु से पहले धोए थे श‍िष्‍यों के पैर–
जिस द‍िन स्‍वामी जी ने शरीर त्‍यागा, उस द‍िन उन्‍होंने अपने हाथों से सभी शिष्यों के पैर धोए। शिष्यों ने संकोच करते हुए स्वामीजी से पूछा, ‘ये क्या बात है?’ स्वामीजी ने कहा, ‘भगवान यीशु ने भी अपने हाथों से शिष्यों के पैर धोए थे।’ शिष्यों के मन में विचार गूंजा, ‘वह तो उनके जीवन का अंतिम दिन था।’
इसके बाद सभी ने भोजन किया। स्वामीजी ने थोड़ा विश्राम किया और दोपहर डेढ़ बजे सभी को हॉल में बुला लिया। तीन बजे तक संस्कृत ग्रंथ लघुसिद्धांत कौमुदी पर मनोरंजक शैली में स्वामीजी पाठ पढ़ाते रहे।

शाम के समय बेलूर मठ में उन्होंने 3 घंटे तक योग किया। शाम के 7 बजे अपने कक्ष में जाते हुए उन्होंने किसी से भी उन्हें व्यवधान ना पहुंचाने की बात कही और रात के 9 बजकर 10 मिनट पर उनकी मृत्यु की खबर मठ में फैल गई।

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