लाइफस्टाइल

इनबॉक्स में जीभ लपलपाते सेक्स के आवारा परिंदे

लाइफस्टाइल 07 Sep, 2018 04:03 AM
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अकलीमा हसन – 31 अगस्त का दिन था. “ऑल आई वांट इज़ ए लिटिल रिस्पेक्ट” (यानी मैं सिर्फ थोड़ा सा सम्मान पाने की चाह रखती हूं) गाने वाली दुनिया की चहेती गायिका अरेथा फ़्रैंकलिन की अंत्येष्टि थी. उनके चाहने वाले उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इकट्ठा हुए थे. उन्हीं में से एक थीं गायिका आरियाना ग्रांदे. उन्होंने अरेथा के परिवार वालों के आग्रह पर अरेथा का ही एक गाना भी गाया.

मैंने जो वीडियो देखा उसमें बिशप चार्ल्स एलिस पोडियम पर खड़े हैं. वह आरियाना को अपने पास बुलाते हैं. आरियाना आती हैं, वे दोनों एक दूसरे को गले लगाते हैं. पर इसके बाद बिशप एलिस का हाथ आरियाना की कमर के ऊपरी हिस्से में अटक जाता है और धीरे-धीरे बिशप की उंगलियां आरियाना के दाहिने स्तन को कोंचने लगती हैं. आरियाना की भाव-भंगिमाओं से, उनकी शारीरिक भाषा से साफ़ दिख रहा है कि वह बेहद असहज हैं, पर उन्हें बिशप के इस सार्वजनिक दुस्साहस और बेशर्मी से निपटने का तत्काल कोई तरीका समझ नहीं आता है.

उस क्षण को और आरियाना की उस असहजता, लाचारगी को देख मैं ख़ुद बेहद लाचार और विचलित महसूस करने लगी. लाइव टीवी पर एक सिंगिंग स्टार के साथ जो हुआ, वह दुनिया की तमाम महिलाओं के साथ हर रोज़ होता रहता है. यह बेहद अफ़सोस की बात है कि आरियाना जैसी सशक्त महिला के साथ भी सरेआम ऐसा हो सकता है. बिशप एलिस की उंगलियों पर आप ध्यान देंगे तो आपको उनकी नृशंस बेशर्मी का अहसास होगा.

इस घटना के ठीक एक दिन पहले, यानी 30 अगस्त को, मेरे पास हिन्दी जगत के एक नए एवं युवा लेखक क्षितिज रॉय का एक वॉट्सऐप मैसेज मुझे आता है. क्षितिज ने ‘गंदी बात’ नाम की एक किताब लिखी है. बात हाय-हैलो से शुरू होती है और बातों-बातों में लेखक साहब बताते हैं कि मेरी तरफ़ उनकी कुछ ‘सेक्सी फीलिंग’ (कामुक इच्छा) हैं जिन्हें वह मुझे बताना तो चाहते हैं मगर इस डर से नहीं कह पा रहे हैं कि शायद मैं उन्हें ब्लॉक कर दूंगी.

यह सब नाटक था. अपनी यौनकुंठा पर शराफत का मजमून चढ़ाने का नाटक. रॉय साहब पहले से ही तय करके आए थे कि मेरे सामने अपनी इच्छा ज़ाहिर करके रहेंगे, तो वह ऐसा कर देते हैं. वह कहते हैं कि मैं उन्हें ‘कच्चा’ न समझूं. उन्हें अपना ‘पक्कापन’ दिखाने का मौका दूं. मैं मौका दूंगी तो वह मुझे इतना ‘गीला’ कर देंगे कि मैं कहीं बताने लायक नहीं रहूंगी. इस तरह उन्होंने अपनी मर्दानगी का अश्लील अट्ठाहास किया.

मेरे साथ क्षितिज रॉय की यह पहली बदतमीजी नहीं थी. इस घटना से लगभग एक साल पहले उनसे मेरी मुलाक़ात दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान में हुई थी. वो मुझसे मिलने के इच्छुक थे. हमारी मुलाक़ात इतनी वाहियात थी कि आधे घंटे के भीतर ही उनसे विदा होकर वापस अपने हॉस्टल आ गई थी. मैंने मन बना लिया था कि दोबारा इस आदमी से नहीं मिलूंगी. फिर उसी दिन शाम को अचानक इसने मुझे अपनी एक शर्टलेस फ़ोटो भेजी. मुझे वो देखकर झुंझलाहट हुई, ग़ुस्सा भी आया. मैंने इसे खूब डांटा, हमारी बहस हुई और मैंने इसे वॉट्सऐप पर ब्लॉक कर दिया. और फ़ेसबुक से भी हटा दिया.

हाल ही में मैं कुछ लोगों को वॉट्सऐप पर अनब्लॉक कर रही थी तो इसे भी अनब्लॉक कर दिया था. लेकिन मैंने सोचा भी नहीं था कि यह दोबारा से मुझे मेसेज कर सकता है. और अगर किया भी तो इस तरह से करेगा यह मेरे ख़याल में भी नहीं आया. साहित्य की दुनिया से जुड़ा एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति, जिसे हमउम्र समझ कर मैंने उसकी ग़लतियों को नजरअंदाज कर दिया. मेरी सोच यह भी थी कि शायद उसमें आत्मग्लानि हो और वह ऐसी हरकतों से बाज़ आ जाए. लेकिन वह इतना गलीज़ निकलेगा यह सच में निराशाजनक था मेरे लिए.

जिस सोशल मीडिया का हम सब दंभ भरते हैं कि वह इतना शक्तिशाली है कि आए दिन विश्व भर में हो रहे आंदोलनों को इससे बल मिलता है, #MeToo जैसे आंदोलन तो इसी माध्यम के चलते इतना असर पैदा कर पाएं हैं. तो मैंने भी उसी सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने की सोची और क्षितिज रॉय की बदतमीजियों को दुनिया के सामने ज़ाहिर कर दिया, सुबूतों के साथ.

उसकी कारगुजारियों को सार्वजनिक करने के आधे घंटे के भीतर उसके घर से मुझे संपर्क किया जाता है. उसके बहनोई का मेरे पास मैसेज और फिर कॉल आता है. वो परिवार की तरफ़ से मुझसे माफ़ी मांगते हैं और मुझसे ही इस समस्या का हल भी पूछते हैं. दूसरी ओर उसकी बहन ने इसी संबंध में मेरी एक सहेली को मैसेज किया. अगले दिन जब मैं क़ानूनी कार्रवाई करने थाने गई तब वहां उसके पिताजी का फोन मेरे पास आया. उसके मम्मी-पापा ने मुझसे अपनी शर्मिंदगी ज़ाहिर करते हुए माफ़ी मांगी. ज़ाहिर सी बात है कोई भी समझदार मां-बाप अपने बेटे की ऐसी करतूत पर ऐसा ही करते. उनके बारंबार आग्रह करने के बाद मैंने शिकायत लिखवाने का इरादा छोड़ दिया. हालांकि मैं यह करना नहीं चाहती थी. पर फिर भी एक मौक़ा देते हुए मैंने ऐसा किया.

दूसरी तरफ़ उधर सोशल मीडिया पर अलग ही कहानी चल रही थी. जैसा कि हर मुद्दे पर होता है, सपोर्ट करने वालों के साथ-साथ, विक्टिम शेमिंग करने वालों का तांता लग गया. उनके कुछ उदाहरण मैं नीचे दे रही हूं-

1) कुछ को जानने की इच्छा थी कि हमारी जान-पहचान कैसे हुई, बातचीत की शुरुआत कहां से हुई?

जान-पहचान चाहे जहां से हो. भले अपराधी मेरा दोस्त ही हो. क्या उसका यह अधिकार है कि वह मुझसे अश्लील बातें कर सके और मेरे आत्मसम्मान को ठेंस पहुंचाए?

2) कई लोग कहने लगे कि इतनी देर बात क्यों की?

हमारे पूरे चैट की अवधि आधे घंटे थी. आप सब जानते हैं कि अगर आप तुरंत-तुरंत रिप्लाई न कर रहे हों तो आधे घंटे क्या, बात चौबीस घंटे भी खिंच सकती है. लोगों को यह देखना चाहिए कि हमारी बात चाहे जितनी लंबी या छोटी हो, उस बातचीत में क्या हुआ क्या? बदतमीज़ी हुई या नहीं? और अगर हुई तो क्या उस पर प्रतिक्रिया लाज़िम नहीं?

3) मैं सीधे उसके घर वालों से या पुलिस से संपर्क कर सकती थी. उनसे शिकायत करती. सोशल मीडिया का सहारा क्यों लिया?

तो क्या आज के इस युग में सोशल मीडिया वह प्लैटफ़ार्म नहीं जहां अपराधी को पब्लिकली शेम किया जाए? उसका कृत्य सार्वजनिक किया जाय ताकि वह आगे से इस तरह का अपराध किसी और लड़की के साथ करने की हिम्मत भी न कर सके. उस वक्त मुझे यह करना सही लगा क्योंकि सोशल मीडिया की ही बदौलत जिन लोगों को हम स्टार बना देते हैं, जिन्हें लेखक और साहित्यकार बुलाने लगते हैं, उनकी असलियत क्या है, यह वहां मौजूद जनता के सामने आनी चाहिए. पुलिस के पास तो मैं गई ही अगले दिन. और मां-बाप से शिकायत क्यों करूं मैं? क्या वह बच्चा है जिसने किसी बच्चे का खिलौना तोड़ दिया. वह एक अपराधी है. उसने यौन हिंसा की, उसका असली चेहरा सामने आना चाहिए.

4) मैंने जब शिकायत न करने का फ़ैसला लिया तो इसपर भी एक पोस्ट लिखकर लोगों को बताया कि मैं कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं कर रही.

और इसमें उसके मां-बाप का ज़िक्र था क्योंकि उन्होंने ही माफ़ी मांगी. इस पर लोग कहने लगे कि मैंने मां-बाप का या उससे जुड़े किसी भी व्यक्ति को क्यों ‘घसीटा’. बल्कि मैंने घसीटा नहीं सिर्फ़ ज़िक्र किया.

5) किसी ने यह भी आशंका जताई कि यह ‘सुनियोजित’ तो नहीं.

अगर यह सुनियोजित होता तो मैंने क्षितिज रॉय को मैसेज किया होता और उससे जबरन कुछ भी बुलवाने की कोशिश करती. यहां उल्टे उस व्यक्ति ने मुझसे बात की और जो भी मन में आया बोलता गया. मैं फिर भी एकदम ठंडे दिमाग़ से सब सुनती रही. लेकिन उसने अपनी हदें लांघ दी.

6) ‘पहले से की गई बदतमीज़ी का बदला तो नहीं यह सोशल मीडिया ट्रायल.’

बिल्कुल भी नहीं. पहले की बदतमीज़ियों पर मुझे जो भी सुनाना था मैं कह चुकी थी उसे. लेकिन फिर भी कोई ऐसा मानता है तो यह बताए कि अपराधी का पर्दाफाश करना कहीं भी बदला कहलाता है क्या?

7) लोगों ने मुझे नारीवाद के उसूल समझाने शुरू किए. कहने लगे मैं उत्तेजित न होऊं और पॉलिटिकली करेक्ट होने की कोशिश करूं.

दुनिया का कौन सा क़ानून अपराध पर भी पॉलिटिकली करेक्टनेस खोजता है भला? आप विक्टिम को ही इतना संतुलित होने की सीख क्यों दे रहे हैं?

8) ‘चार दिन तक पोस्ट क्यों किया?’

मैंने सिर्फ़ एक पोस्ट लिखा था उस पर. बाक़ी सारी पोस्ट्स उस पोस्ट की प्रतिक्रिया पर किया है. मुझे इसे लंबा खींचना होता तो मैं और लंबा खींच सकती थी. लेकिन मैं ख़ुद मानसिक रूप से इतने तनाव में थी कि यह सब बंद करना चाहती थी. यह बात भी मैंने लिखा था. लेकिन लोग मुझे जज करने का कोई मौक़ा गंवाते नज़र नहीं आए.

9) ‘अब जाने भी, दो माफ़ भी कर दो.’

क्या आप माफ़ कर देते? और मैंने तो कर ही दिया. इसीलिए क़ानूनी कार्रवाई नहीं की. लेकिन जितना भी मैंने किया उतना भी आपके अंदर का मर्दवाद पचा नहीं पाया और आप मुझे कोसते रहे.

10) मेरे चरित्र पर भी सवाल उठे कि कहीं मेरा कोई ‘अंतरंग’ संबंध तो नहीं था अपराधी के साथ.

मेरे क्या संबंध थे यह मैं बता चुकी हूं. कुछ दुविधा रह गई हो तो आप अपराधी से ही पूछ लें. बाक़ी आपकी छोटी सोच का मैं क्या जवाब दूं? 108 तोपों की सलामी देने को जी चाहता है ऐसे लोगों को.

सोशल मीडिया पर जो कुछ भी मेरे साथ हुआ, वो कोई नई बात नहीं है. आम जीवन में भी, दोषी के बजाए, विक्टिम पर ही इल्ज़ाम लगाने का मानो रिवाज सा है. यही कारण है कि महिलाएं अपने ऊपर हुई हिंसा, चाहे शारीरिक हो या मानसिक पर बात नहीं करतीं, जघन्य अपराधों में भी क़ानूनी शिकायत नहीं करतीं. और इस तरह बलात्कार जैसी चीज़ें सामान्य हो जाती हैं. महिलाओं की सुरक्षा और महिला सशक्तिकरण के तमाम दावों के बावजूद सच्चाई यही है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के मामले में भारत काफी ऊंचा रसूख रखता है. जब तक लोग पीड़ित के प्रति अपनी सोच नहीं बदलेंगे तब तक ये तमाम बातें महज़ लफ़्फ़ाज़ी के सिवा कुछ नहीं हैं.

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