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दीपावली पर ऋग्वेद में भी है अग्नि क्रीड़ा का वर्णन इसलिए चिन्ता छोड़िए, बम फोड़िए – MM NEWS TV

पत्रकार ब्लॉग 11 Oct, 2017 02:00 PM
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MM NEWS TV / आशीष मेहता — कुछ लोग कह रहे हैं कि राम के आगमन पर पटाखे नहीं चलाए गए थे, इसलिए दिवाली पर पटाखे नहीं जलाए जाने चाहिए। दीपावली पर पटाखों से होने वाले कथित प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी दिल्ली एनसीआर में रोक लगा दी है। हालांकि ऋग्वेद में अग्नि क्रीड़ा के बारे में वर्णन मिलता है। जो राम से भी पहले के हैं। और ये वर्णन साल के ठीक उसी समय में मिलता है जिस समय दीपावली का त्यौहार आता है

दिवाली का त्यौहार ऋतु परिवर्तन का त्यौहार है। बरसात में होने वाले कीड़े मकौड़ों से छुटकारे के लिए दिवाली पर साफ सफाई के साथ ही कच्चे मकानों पर गोबर की लिपाई और पक्के मकानों पर चूने की पुताई की जाती है। जिससे घरों नमी के कारण से पनपने वाले कीटों का नाश हो सके। अब बात करते हैं दिवाली पर आतिशबाजी की। बरसात के समय भारी मात्रा में कीड़े उत्पन्न हो जाते हैं। आतिशबाजी के कारण से एक दिन हवा के जहरीली हो जाने से इनकी भारी संख्या में मृत्यु हो जाती है। बुजुर्ग कहते हैं कि दीपावली का दीया देखने के बाद कीट-पतंगे गायब हो जाते हैं। हालांकि, प्रकृति में हानिकारक एवं गुणकारी दोनों प्रकार के कीटाणु होते हैं, वायुमंडल में हानिप्रद कीटाणु ज्यादा होने से कुल प्रभाव लाभप्रद रहता है।

सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट के पूर्व वैज्ञानिक डॉ नरेंद्र मेहरोत्रा के अनुसार, जहरीली गैसों के सम्मिश्रण का भी प्रभाव होता है। आवाज वाले पटाखों में सल्फर ज्यादा होता है, जबकि रोशनी वाले पटाखों में फास्फोरस ज्यादा होता है। पटाखों में अलग-अलग रंग लाने के लिए पोटैशियम, स्ट्रांशियम का उपयोग होता है। पटाखों से यदि इन तत्वों की मिश्रित गैस निकले, तो कीटनाशक कार्य ज्यादा अच्छी तरह होता है। यदि एक ही प्रकार के पटाखे चलाये गये और एक ही गैस निकली, तो कीटनाशक कार्य मंद पड़ जाता है। उस गैस की अधिकता से हमें ज्यादा नुकसान होता है। इसलिए सरकार को चाहिए कि पटाखों पर तत्वों का ब्योरा छापना अनिवार्य कर दे, जिससे उपभोक्ता को पता लगे कि किस गैस का उत्सर्जन हो रहा है।

पटाखों में गंधक का उपयोग विशेष रूप से किया जाता है। गंधक का फसल पर लाभकारी प्रभाव पड़ता है। गांवों में मान्यता है कि पटाखे जलाने से पाला (ठंड) ज्यादा पड़ता है, जो फसलों के लिए लाभदायक है। पटाखों में कई प्रकार के तत्वों का उपयोग होता है। कुछ हानिप्रद होते हैं कुछ नहीं। सरकार को चाहिए कि हानिप्रद तत्वों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाए। पटाखों में कार्बन के स्थान पर नाइट्रोजन का उपयोग करने से धुआं कम पैदा होता है और उतने ही तत्वों के उपयोग से ज्यादा रोशनी उत्पन्न होती है। हमारी परंपरा में सरसों तेल के दीये को जलाने की विशेष प्रथा रही है। इसका मनोवैज्ञानिक पक्ष है। इससे हमारे स्पाइनल कॉर्ड के निचले हिस्से पर सुप्रभाव पड़ता है। सरसों के तेल से कीटाणु भागते हैं और वायुमंडल शुद्ध होता है।

जरूरत पटाखों को बंद करने की नहीं, बल्कि इन्हें सुदिशा देने की है। सभी पटाखों पर तत्वों एवं कार्बन उत्सर्जन के लेबल लगाना अनिवार्य बना देना चाहिए। जनता को बताना चाहिए कि मिश्रित पटाखों का उपयोग करें, जिससे विभिन्न तत्वों की गैस का उत्सर्जन हो और इनसे होनेवाले कीटनाशक लाभ हो, हम उम्दा हासिल कर सकें। हर क्षेत्र में पटाखों की उपयुक्त मात्रा को निर्धारित करना चाहिए। अधिक पटाखे जलाने के लिए खुले मैदान में अलग स्थान बना देना चाहिए। ग्रीन पटाखों के उत्पादन की पहल करनी चाहिए। बिजली की लड़ियों के स्थान पर सरसों के दीये को जलाने की परंपरा को फिर से कायम करनी चाहिए। वैसे भी हिन्दु यदि एक दिन थोड़ा तथाकथित प्रदूषण करते हैं तो हवन और यज्ञ के द्वारा शुद्ध भी करते हैं। इसलिए चिन्ता छोड़िए और बम फोड़िए।

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