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नर्मदा किनारे के पारंपारिक तीर्थ हुए भंगार- पर्यावरण और आदिवासी की कीमत पर पर्यटन का श्रृंगार

पत्रकार ब्लॉग 29 Oct, 2018 04:07 AM
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नर्मदा पर बनी सरदार सरोवर जैसी एकेक परियोजना के लाभ-हानि की पोलखोल तो हो ही चुकी है, लेकिन अब फिर दुनिया के सबसे उंचे, 182 मीटर्स के सरदार पटेलजी के स्टेच्यू याने पुतले की भी सच्चाई हो रही है ।सरदार पटेल स्टेच्यु का नाम फाँर युनिटी याने एकात्मता के बनाये जा रहे इस पुतले से आदिवासी और शहरवासी या धनिकों के बीच में दरार खडी का जा रही है। वैसे तो गुजरात का हर समुदाय किसान – मजदूर, मछुआरे, आदिवासी नर्मदा से वंचित और आक्रोशित है ही, लेकिन सरदार सरोवर के नीचेवास में सूखी पडी नर्मद में 31 अक्टूबर के ‘ स्टेच्यू ‘ के उदघाटन के महोत्सव के लिए मात्र कुछ पानी वहां भरने की साजिश जरक पर नमक छीडकाने जैसी है। साथ ही इस पुतले के लिए पानी सरदार सरोवर से लागत निर्मित 5 तालाबों में से छोडा जा रहा है, जिससे कि आदिवासी और अन्य किसानों को मिलने वाले पानी और सिंचाई में और ही कमी आएगी लेकिन इस स्टेच्यू को किसानतर्फी होने का प्रतीक बताने की और उससे न केवल गुजरात और केन्द्र शासन की बल्कि मोदीजी की प्रतिमा किसानहितेषी की बनाने की राजनीति नहीं तो क्या ?

सरदार पटेल पुतला जहां खडा किया है, वह ‘साधु बेट ‘ आदिवासियों का श्रध्दास्थान, ‘वराता बाबा टेकडी‘ के नाम से जाना जाता था। उनकी आस्था दबाकर पुतला खडा किया जा रहा है, जिसमें भी स्थानिक आदिवासी मजदूरों के बदले 1500 चिनी मजूदरों को कार्य में लगाना क्या देशहित है ? इस परियोजना से कम से कम 72 आदिवासी गांवों पर असर होना है, उन्हें पूरी पर्यटन योजना का असर तक नहीं बताया गया है, लेकिन उनकी जमीन छीनने की शुरूआत हो चुकी है। नर्मदा का पानी, नदी बहना रूकने से, समुंदर आने से खारा हुआ, तबसे गाववासी, किसान, मछुआरे और उद्योग भी हैरान है, उन्हें अब नर्मदा का पर्यटन से प्रदूषण बढकर और भी परेशान होना है…. उनकी भूमी, पानी, जंगल भी खतरे में है ।

इस स्थिति में 1961 से सरदार सरोवर परियोजना से काॅलोनी के लिए उजाडे गये 6 गांव, गरूडेश्वर वेयर के लिए उजाडे गये 9 गांव, डूब से प्रभावित 19 गांव, नहरों से प्रभावित कम से कम 2000 परिवार ( अन्य हजारों 25 प्रतिशत से कम जमीन अधिग्रहित हुए ) और इस पर्यटन परियोजना से और 72 आदिवासी गांवों पर असर, यह अन्याय है। इन गांवों के हजारो परिवार 31 अक्टूबर के रोज इसीलिए आदिवासी विरोधी दिवस मनाएंगे, चूल्हा बंद रखेंगे तो वह सरदार पटेल जैसे राष्ट्रीय एकात्मता, सर्वधर्म-समभाव, किसान आंदोलन के प्रतीक के खिलाफ नहीं, उनके नाम पर आदिवासियों के साथ हो रहे अन्याय और नर्मदा के विनाश और व्यापार कर प्रतिरोध है, यह समझना जरूरी है।

सरदार पटेल स्टेच्यू जो बांध से मात्र 3.5 कि.मी. की दूरी पर और शूलपाणीश्वर अभयाराय से 2 कि.मी. की पूरी पर है, उसकी नीव नर्मदा ही भूकंप श्रवण क्षेत्र में होने से खोखली होगी ही लेकिन इसकी आर्थिक बुनियाद भी अवैध होने से सीएजी की रिपोर्ट द्वारा इस पर सवाल उठाया गया है। 3500 करोड रू तक का इस स्टेच्यू पर खर्च सरदार सरोवर निगम से किया गया और कुछ 150 से 200 करोड रू. सार्वजनिक उद्योगों से, जैसे oil & petroleum corporation, गुजरात से सीएसआर के नाम पर निकाला गया है। सीएजी रिपोर्ट के अनुसार पुतले का निर्माण CSR कार्य नहीं कहा जा सकता है इसलिए यह अवैधता है।

आज तक पर्यटन परियोजना, जिसमें 2 टेन्ट सिटीज, एक बडा 40 मंजिली श्रेष्ठ भारत भवन, कई सारे राज्यों के दिल्ली में है वैसे प्रस्तावित भवन आदि से भरपूर निर्माण हुआ या प्रोजेक्ट प्रस्तावित न करते हुए, डेढ साल पहले, राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण को भी पर्यटन परियोजना की बात मात्र सपना है, उसे सामने रखकर ‘‘ मंजुरी ‘‘ पर सवाल उठाने वाली याचिका को शासन ने राज्य व केन्द्र झूठा ठहराव और मात्र ‘‘ देरी ‘‘ ( limitation ) के मुददे पर वह याचिका खारिज हुई। लेकिन आज 120 कि.मी. के 6 लेन हायवे के लिए हजारों 100 साल से भी पुराने, पेड काटने से नर्मदा प्रदूषित करने, आदिवासीयों को विस्थापित करने जैसे तमाम असरों को नजर अंदाज करना और पर्यावरणीय तथा सामाजिक असर के अध्ययन के बिना, इतनी बडी परियोजना आगे धकेलना हो रहा है।

संयुक्त राष्ट्र संघ से कोई पर्यावरण पुरस्कार पाने वाले प्रधानमंत्री भले ही पुलिस बलके सहारे, इसका उद्घाटन भी कर ले लेकिन क्या इसके आधार पर वे आदिवासीयों के और किसानों के हितेषी साबित होंगे या विरोधी ?

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