राजस्थान

संवैधानिक मान्यता के लिए तरस रही दुनिया के सबसे बड़े शब्दकोष की भाषा,वीरो की माटी..

राजस्थान 22 Mar, 2018 08:13 AM
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यह महज शीर्षक नहीं। एक पीड़ा है। एक आग्रह है। एक मांग है। करोड़ों राजस्थानियों की चेतावनी है जिन की भाषा आज भी गूंगी है। जिन की भाषा राजस्थानी आजादी के इतने साल बाद भी संवैधानिक मान्यता के लिए तरस रही है। अब उसे उसका अधिकार मिल ही जाना चाहिए। शहर की लगभग सभी हथाईयों पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे। आपणे राजस्थान की देश में एक अलग ही पहचान है। सातसमंदर पार तक इसके धूंसे बजते हैं। विश्व के ज्यादातर क्षेत्रों में राजस्थान की माटी खाकर मोट्यार हुए लोग झंडे गाड़ चुके हैं।इतिहास के पन्नों में राजस्थान का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज है।  राजस्थान है ही ऐसा कि हरेक को गले लगा लेता है। अपना बना लेता है। राज्य की धरती धोरों के साथ वीरप्रसूता भी है। महाराणा प्रताप की वीरता के किस्से आज भी राजस्थान के कण-कण में रचे-बसे हैं। यहां के भामाशाह तो भामाशाहों के भामाशाह। एक से बढकर एक सेवाभावी। एक से बढकर एक दानवीर। वीरों की संया भी बेहिसाब-दानवीरों की तादाद भी अगणित।

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शेखावाटी और मारवाड़ के ज्यादातर वीर सपूत सरहदों परडटे हुए हैं। कई की तो पीढिय़ां फौज में। जोधपुर जिले के शेरगढ उपखंड के लगभग सभी गांवों के युवक फौज में हैं। हाइफा हीरोमेजर दलपत सिंह शेखावत और मेजर शैतानसिंह की वीरता की गाथा अमर है। देश को ये सपूत राजस्थान ने ही दिए। सीमाओं कीरक्षा करते-करते राज्य के कईजवान शहीद हो गए। इसके बावजूद उन के परिजनों में देशसेवा का जज्बा हिलोरे मारता है। राष्ट्र प्रेम ठाठे मारता है। मां-बाप गर्व से कहते हैं कि अन्य बेटों को भी सेना में भेजेंगे। शहीदों के मासूम बेटा-बेटी भी सेना में भर्ती होने की बात कहते नहीं थकते।यहां का कण-कण कहता है-‘मायड़ ऐड़ा पूत जिण, कै दाता कैसूर।’ स्वाधीनता आंदोलन में राज्य का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। मुगल शासकों के दांत खट्टे करने वाला आपणा राजस्थानही था। फौजों को ऐसा ठोका कि एक मुगल बादशाह को कहना पड़ा-‘दो मुट्ठी अनाज के लिए मैं दिल्ली की सल्तनत गंवा देता। राजस्थान और राजस्थानी किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं यहां की शहद घुली बोली। आओ तो पधारो सा-जाओ तो पधारो सा। यहां का रहन-सहन। यहां की अपणायत। यहां का अपनापा। यहां का खान-पान। यहां का पहनावा। यहां की मेहमानवाजी। विदेशी पावणे भारत भ्रमण पे आएं और राजस्थान के दीदार ना करें ऐसा हो ही सकता।जैसलमेर में रेत के समंदर और चमकती-दमकती हवेलियां। गुलाबीनगरी हो या सूर्यनगरी अथवा झीलों की नगरी। वाजानगरी अजमेरहो या नमकीन सेव का शहर बीकानेर। यहां के महल-माळिए। यहांके एतिहासिक धरोहर। राजस्थान विदेशी मेहमानों की पहली पसंद।राजस्थान का साहित्य भी समृद्ध। है। कविवर स्व.कन्हैयालाल सेठिया की कविताएं आम राजस्थानी की जुबां पर है। अरे घास रीरोटी-ने जद वन बिलावड़ो ले भाग्यो नन्हों सो अमर्यो चीख पडय़ो-राणा रो सोयो दुख जाग्यो..जद याद करूं हल्दी घाटी, नैणा में रगतउतर आवै..’सुनते-गुनगुनाते हैं तो मुट्ठियां तन जाती है।

 

पद्मश्री स्व.सीताराम लालस ने राजस्थानी भाषा के जिस शद कोष की रचना की वह अब तक का सबसे बड़ा शद कोष है। इतना कुछ होने के बावजूद अफसोस के साथ कहना-लिखना पड़ता है कि हमारे पास जुबान-भाषा और बोली होते हुए भी गूंगे हैं। हमारे पास भाषा-बोली तो है मगर वो संवैधानिक मान्यता के लिए आज भी तरस रही है। अमेरिका ने राजस्थानी भाषा को पूरा मानसमान दिया हुआ है मगर राजस्थान के लोग अपने ही देश भाषा की मान्यता की राह तक रहे हैं। यह बेहद अफोससनाक है। बेहदशर्मनाक है।राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए समय-समय पर शांतिपूर्वक आंदोलन हुए। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने विधानसभा में संकल्प पारित कर केंद्र सरकार को भेजा हुआ है। इस बात को भीसालों बीत गए मगर किसी ने सुध नहीं ली। कई बार ऐसा लगता है कि सरकार भीड़ की भाषा समझती है। भीड़ जुटाकर जयपुर से दिल्ली कूच करना हमें भी आता है। रेले रोकना-सडकें जाम करना हमें भी आता है। हम विधानसभा-संसद घेरने का मादा रखते हैं। पर ऐसा नहीं कर रहे है। हम अपणायत वाले प्रदेश के शांतिप्रिय नागरिक हैं। सरकार हमारे सब्र का इतिहान ना ले। आश्वासन खूब मिल चुके। राजस्थानी बुजुर्ग साहित्यकार देव किशन राजपुरोहित द्वारा दिल्ली में 19 मार्च को शुरू किए गए आमरण अनशन के दौरान भी केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथसिंह ने एक बार फिर कार्रवाई का आश्वासन दिया। जिस पर शाम को अनशन तोड़ दिया गया। चाहते तो अनशनपे डटे रहते पर ऐसा इसलिए नहीं किया कि हमने श्री सिंह की जुबानपर यकीन कर लिया। अब केंद्र सरकार को चाहिए कि वो राजस्थान की आन-बान-शान की रक्षा करते हुए हमारी मायड़ भाषा को संवैधानिक मान्यता दे। हमने खूब आश्वासन झेल लिए। अब हमारी राजस्थानी को उसका संवैधानिक अधिकार मिलना ही चाहिए। इसी उमीद के साथ-‘जै-जै राजस्थान।’
लेखक – गुरुदत्त अवस्थी

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