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सैंकड़ों साल पूर्व के आयुर्वेदिक/देसी फसल कीट, रोग नियंत्रण नुक्ते की वर्तमान में पड़ने लगी जरूरत

देश 07 Dec, 2017 10:57 AM
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✍🏼फसलों पर अंधाधुंध रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल होने से यहां आर्थिक नुकसाऩ हुआ है वहीं आवोहवा भी दूषित हुई है।अधिक रसायनों के उपयोग से खाद्यान्न जहर बन चुके हैं।मानव एवं मवेशियों की प्रतिरोधक क्षमता क्षीण हुई जिससे शरीर बिमारियों से लड़ पाने में अक्षम हो गए हैं।

केमिकल फर्टिलाइजर्स से कृषि भूमि की उर्वरक क्षमता दिनबदिन घटती जा रही है।

हमने एक धारणा अपने अंदर पैदा करली है कि हर काम जल्दी से चुटकियों में सम्पन्न हो।इस *जल्दी* ने किसान का जीवन बेजह व्यस्ततम कर दिया है।
आज एक बार फिर *हमारी कृषि धरती को पुरखों की परखी हुई विधियों से पोषित करने की आवश्यकता है*। बागड़ के सूझवान नौजवान पढ़ेलिखे अब इस ओर अधिक आकर्षित होते दिख रहे हैं।उस क्षेत्र में काफी खाद्यान्न गैररासायनिक विकल्पों के पैदा करने में अग्रसर हो रहे हैं।
ये तरीके कुछ मेहनत अधिक लेते हैं ,मगर इनकी *बहुमुखी उपयोगिता चिरस्थाई लाभकारी है।*
आपको बताना चाहूंगा कि मैंने भी *नीम* कीटनाशक 2006-7 व 2007-8 में मेरे काश्तकार मुंशी राम के सहयोग से तैयार किया था जिसका उपयोग नरमा, सरसों व गेहूं पर किया था ,जो काफी कामयाब साबित हुआ।

घर की तंगी के चलते माताएं घी-दूध भी बच्चों के मुहं से छीनकर बेचने पर मजबूर होरही हैं।किसान *फसलों का कचरा भी बेचने को मजबूर है*।
जिन्स  के *भार -भाव* दोनों ही साथ नहीं दे रहे किसान की मेहनत का, जिससे किसान फसलों का अपशिष्ट(कचरा) बेचकर कुछ भरपाई करता है।

बुजुर्ग पल्लर, पराली,पते एवं छिलके आदि खेत में बिछाकर पलटाऊ हल़ चला कर मिट्टी में मिला देते थे जो गलकर एक अच्छी खाद का रूप ले लेते थे।
परम्परागत खेती से किसान व खेतीहरमजदूर आर्थिक तौर पर प्रायः संतुष्ट थे।लेकिन सरकारों की अधिक अनाज उत्पादन की योजनाओं ने किसान और जमीन को *बेसहारा सा करके छोड़ दिया है।*
अधिक खाद्यान्न उत्पादन के तौरतरीके तो ईजाद कर दिए, ,मगर उन तरीकों को जिस ढंग से आगे बढाना था ,वैसा काम हुआ नहीं।
यह बात किसान के भी जहन में नहीं आई कि कृषि योजनाओं की नवीन तकनीक से हम अधिक उत्पादन तो देने योग्य बन गए मगर *हमें इसमें क्या मिला? कोरी लागत बढ़ी , लाभ कोसों दूर पछड़कर रह गया।*
सरकारों को भरपूर खाद्यान्न चाहिए था ,जो मिलने लग गया । किसान व  खेती  की  बेकदरी  होने लगी जिसका नतीजा *जमीन बंजर व पहाड़ेपर हो गई और किसान बैंकों व साहूकारों का दबेल होता गया।*

खेती के पारम्परिक तरीके का हाल ही का एक उदाहरण आपके समक्ष दे रहा हूँ , जो गंगानगर जिले के दो किसानों का है।
पाकिस्तान सीमा के पास चक 3 एच बड़ा के किसान किशोर खोथ अपने 12 साल पुराने किन्नू के बाग से खुश थे कि पिछले साल सितंबर में उनकी खुशी तब काफूर होने लगी, जब बाग के पौधे जलने शुरू हुए। उन्होंने बाग बचाने के लिए लाखों रु. खर्च कर डाले, लेकिन बाग को बचाने का उपाय तो कृषि वैज्ञानिकों  के पास भी न मिला।   उद्यान विभाग से भी कोई रास्ता  न  निकला। लाचार किशोर खोथ ने कलेक्टर को एप्लीकेशन लगाई। इस पर कृषि वैज्ञानिक एवं बागवानी विभाग की टीम ने दौरा कर बाग उखाड़ने की सलाह दी। जलते बाग को बचाने की आखिरी उम्मीद भी खत्म होती देख किशोर पस्त सा हो गए। मायूसी में उसे किसी ने *जीव-अमृत से बागों के रखरखाव में लगे रणदीपसिंह कंग* को बाग दिखाने की सलाह दी। कंग की *गोमूत्र*आदि से तैयार *जीव अमृत*ने मामूली पैसों में अंतत: बाग को बचा लिया। फतूही ग्राम पंचायत के चक 3 एच बड़ा में किशोर खोथ के खेत में 450 पौधे किन्नू और 400 पौधे माल्टा का बाग है। पिछले साल सितंबर में अचानक किन्नू के दो पौधे समूल सूखकर नष्ट हो गए। यहां से शुरू होती है किशोर की दुखभरी कहानी। किशोर ने उद्यान विभाग के अधिकारियों, पंजकोसी स्थित जाखड़ फार्म के वैज्ञानिकों, स्थानीय कृषि अनुसंधान केंद्र के बागवानी विशेषज्ञों, चौटाला फार्म के बागवानी विशेषज्ञों एवं डबवाली स्थित अखिल भारतीय किन्नू संवर्धन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों को बाग दिखाया। सभी लोगों ने अलग-अलग राय दी। अधिकारियों एवं वैज्ञानिकों ने लाखों रुपए की दवाएं डलवा दी, लेकिन बाग नहीं बचा। आखिर वे चक 20 एफ स्थित जीव अमृत तैयार कर रहे रणदीपसिंह कंग के पास गए। कंग ने 8 हजार रुपए प्रति बीघा लागत से बाग को पुनर्जीवित कर डाला। खोथ ने बताया कि अब वे गोमूत्र, गोबर, बेसन, हरी मिर्च, तंबाकू, धतूरा आदि से तैयार जीव अमृत का साप्ताहिक और पाक्षिक छिड़काव करते हैं। मई के बाद एक भी पौधा नहीं सूखा है।
*हमें देर-सवेर  हमारे बुजुर्गों की पारम्परिक खेती की तरकीब अपनानी ही होगी , तभी हम  लाभ की ओर मुड़ पाएंगे एवं कर्जविहीन जिंदगी जी सकेंगे।*

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